Triple Talaq- मुस्लिम समुदाय के अनुसार सभी औरतों को है समानता का अधिकार

0
81
ट्रिपल तलाक

ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) से कईं पौराणिक और सामाजिक झूठी बातें सामने आती रहीं हैं. इनमें से बहुत सी बातों को तर्क बनाकर हमारे सामने पेश किया जाता है कुछ ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) के पक्ष में तो कुछ इसके विपक्ष में. लेकिन आज हम आपको इन तथ्यों से जुड़ी सच्चाई और इनमें छिपे झूठ को आपके सामने लाने जा रहे हैं. इन तथ्यों में कितनी सच्चाई है इसकी जांच इस लेख में की गई है.

ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) आख़िर क्या है मसला

दरअसल इस्लाम में तलाक़ का अधिकार सिर्फ़ पति को है और सारा झगड़ा इसी बात को लेकर है. इस्लाम में तलाक देने के तीन पड़ाव हैं: तलाक-ए-रजई, तलाक-ए-बाइन और तलाक-ए-मुगल्लज़ा.

तलाक-ए-रजई

इस्लाम के अनुसार यह तलाक का पहला पड़ाव है. इस्लाम की आज्ञा है कि अगर कोई पति अपनी बीवी से छुटकारा चाहता है तो पहले वह अपनी पत्नी को एक तलाक दे और पति यह बात ध्यान में रखे कि वह तलाक भी माहवारी के समय न दे, यदि उसकी बीवी माहवारी में है तो माहवारी खत्म होने का इंतजार करे और फिर पहला तलाक देने के बाद अगले एक महीना तक दोनों सोचने का समय ले लें और इस दौरान यदि राय बदल गई तो पति अपने तलाक को वापस लेकर अपनी बीवी के साथ रह सकता है लेकिन अगर तलाक वापिस नहीं लिया तो दूसरे महीने पति को अपनी पत्नी को दूसरा तलाक देना होगा पर दूसरे महीने भी पति को यह हक़ है कि वो तलाक को वापस ले सकता है. इसिलए इसे तलाक-ए-रजई कहा गया है.

तलाक-ए-बाइन

यह इस्लामी तलाक का दूसरा पड़ाव है. यदि शुरुआती दो महीनों में पति तलाक को वापस नहीं लेता है और तीसरा महीना शुरू हो जाता है तो इस्लाम में इसका अर्थ है कि अब तलाक पड़ चुका है और इसको तलाक-ए-बाइन कहा जाता है. इस तलाक के बाद भी पति-पत्नी साथ आ सकते हैं, लेकिन इसके लिए पति के चाहने के बावजूद अब पत्नी का राजी होना भी बहुत जरूरी हो जाता है. अगर अब दोनों राजी होंगे तो दोबारा निकाह होगा और वह फिर से पति-पत्नी बने रह सकते हैं अन्यथा नहीं.

तलाक-ए-मुगल्लज़ा

यह इस्लामी तलाक का आखिरी पड़ाव है. यदि तीसरे महीने में भी पति ने ये कहा कि मैं तुमको तीसरी बार भी तलाक देता हूं, तो ऐसा कहने के बाद इसका अर्थ है कि आखिरी तलाक भी हो चुका है. इस्लाम में इसे तलाक-ए-मुगल्लज़ा कहते हैं. अब इस पड़ाव के बाद दोनों के बीच निकाह नहीं हो सकता है.

अब जानिए क्या है ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) यानि तलाक-ए-बिद्अत ?

शिया और सुन्नी का वहाबी दल अहल-ए-हदीस तलाक-ए-बिद्अत को सिरे से नकारता आया है. तलाक-ए-बिद्अत का अर्थ है कि यदि कोई पति तलाक के सही तरीके को नकारते हुए एक ही बार में तीन बार तलाक, तलाक और तलाक कह देता है तो यह तीन तलाक में मान लिया जाएगा, यानि कि यह तलाक-ए-मुगल्लज़ा हो गया. अब पति-पत्नी बिल्कुल साथ नहीं रह सकते और दोबारा शादी भी नहीं हो सकती तथा किसी भी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता, तलाक को वापस नहीं लिया जा सकता… चाहे पति ने गुस्से में ही तीन तलाक क्यों ना कह दिया हो अब तलाक़ मुकरर्र माना गया.

दुनिया में सुन्नी मुसलमानों के चार स्कूल ऑफ थॉट हैं और ये चारों स्कूल तलाक-ए-बिद्अत पर अमल करते हैं. भारत सबसे बड़े स्कूल ऑफ थॉट हनफी स्कूल का केंद्र है. यहां मुसलमानों की करीब 90 फीसदी आबादी सुन्नी है और वो चाहें सूफी हों या देवबंदी या बरेलवी.. ये सभी हनफी स्कूल को फॉलो करते हैं यानि तीन तलाक को मानते हैं.भारत में ऐसे बहुत कम लोग हैं जो अहल-ए-हदीस को मानते हैं और इन सब के चलते ट्रिपल तलाक़ से जुड़ी ज़्यादातर मुसीबतों का सामना इस्लाम वर्ग की महिलाओं को ही करना पड़ता है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here