Lingashtakam: जानिए “ब्रह्मा मुरारी सुरार्चिता लिंगम” के अर्थ और लाभ

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Lingashtakam
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हिंदू धर्म में सभी भगवानों की पूजा के लिए प्रतिमा अर्थात मूर्ति का विशेष महत्व है लेकिन भगवान शिव एकमात्र ऐसे हिंदू भगवान हैं, जिनकी अर्चना उनकी मूर्ति के स्वरूप से नहीं बल्कि उनके शिवलिंग से की जाती है. भगवान शिव को महेश, शंकर, नीलकंठ, महादेव जैसे कईं नामों से जाना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस पूरे ब्रह्माण्ड की सरंचना स्वयं महाकाल ने ही की है जो आज भी इसकी रक्षा के लिए तत्पर हैं. आज हम आपको भगवान शिव के लिंगाष्टकम (Lingashtakam) स्वरूप के बारे में बताने जा रहे है, जिससे बहुत से लोग आज भी अनजान हैं.

शिवलिंगम गतिशील ऊर्जा शक्ति के साथ सार्वभौमिक आत्म के अभिव्यक्ति के रूप में सम्मानित एक पवित्र प्रतीक है. शिवलिंग के रूप में शिव की पूजा करना मुक्ति पाने का सबसे अच्छा माध्यम है. लिंगाष्टकम (Lingashtakam) भगवान शिव की प्रशंसा करने वाला 8 श्लोकों का एक स्त्रोत है. इस स्त्रोत के जरिये हम भगवान शिव को प्यार, विश्वास, आज्ञाकारिता और भक्ति भावना ज़ाहिर कर सकते हैं.

शक्तिशाली शिव लिंगाष्टकम (Lingashtakam) स्त्रोतम

भगवान शिव की प्रशंसा करने के लिए अर्थात शिव भगवान को प्रसन्न करने के सबसे प्रभावी तरीको में से एक लिंगाष्टकम (Lingashtakam) स्त्रोतम को सबसे उत्तम माना गया है. इसके आठ श्लोकों के उचारण से हम शिव को आठ नमस्कार अर्पित करते हैं. यह प्रार्थना शिव लिंग और इसकी महानता को एक विस्तृत रूप में महिमा देती है. इस भजन के प्रत्येक स्तम्भ में भगवान की महिमा और शिवलिंग की पूजा करने के लाभ सूचीबद्ध हैं. लिंगाष्टकम का हर शंद इस बात की गवाही देता है कि पूरी सृष्टि महाकाल के रूप का गुणगान कर रही है. शान्ति से भरे यह श्लोक हमें पुनर्जन्म के चक्र से हमेशा के लिए मुक्ति दिलाते हैं.

लिंगाष्टकम (Lingashtakam) के अर्थ

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम्
निर्मलभासित शोभित लिंगम्।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥1॥

अर्थ: इस श्लोक के अनुसार जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, संसार के सिर्जनहार हैं और जन्म मरन से लेकर हर दुःख और पीड़ा का नाश करते हैं, ऐसे भगवान आशुतोष को मेरा नित्य निरंतर प्रणाम है.

देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम्
कामदहन करुणाकर लिंगम्।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥

अर्थ: इस श्लोक के अनुसार शिव भगवान सभी ऋषियों और मुनियों के आराध्य देव हैं. वह हर देवी-देवता और ऋषि-मुनि द्वारा पूजे जाते हैं. वह हर गलत कर्म का नाश करते हैं और अपनी दया एवं करुणा भावना से काल को हराते हैं. श्लोक के अनुसार शिव की करुणा ने रावण जैसे अंधकारी का अहंकार भी नष्ट कर दिया था. ऐसे भगवान को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ.

सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम्
बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥

अर्थ: इस स्त्रोत के अनुसार हम भगवान से कहते हैं कि भगवान का यह रूप हर प्रकार के सुगंधित इत्रों को दर्शाता है. शिव का यह रूप हमारी बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी भगवान के लिंग स्वरुप को मेरा कोटि- कोटि प्रणाम है.

कनक महामणि भूषित लिंगम्
फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥

अर्थ: उपरोक्त श्लोक में हम कहते हैं कि लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, अर्थात भगवान शिव चारों तरफ से साँपों से घिरे हुए हैं और उन्होंने माता सती के पिता के यज्ञ का विध्वंस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को मैं बार बार प्रणाम करता हूँ.

कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम्
पंकज हार सुशोभित लिंगम् ।
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥

अर्थ: इस श्लोक के अनुसार देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ.

देवगणार्चित सेवित लिंगम्
भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्।
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥

अर्थ: इस श्लोक के अनुसार शिव का तेज़ सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे भगवान सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है इसलिए लिंगस्वरूप भगवान शिव को मेरा बार-बार प्रणाम है.

अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम्
सर्व समुद्भव कारण लिंगम्।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥

अर्थ: जो भगवान शिव पुष्पों की कलियों के मध्य में विराजमान है, जो दुनिया में होने वाली हर घटना और रचना के लेखक हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं बार बार प्रणाम करता हूँ.

सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम्
सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्।
परात्परं परमात्मक लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥

अर्थ: इस श्लोक के अनुसार हर प्रकार के देवी- देवता, गुरुजन उस महाकाल को पूजते हैं, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से की जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका न आदि है और न ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ.

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

अर्थ: जो व्यक्ति सच्चे मन से लिंगाष्टकम (Lingashtakam) अर्थात शिवलिंग के समीप श्रद्धा सहित पाठ करता है, उसे भगवान द्वारा शिवलोक की प्राप्ति होती है और भगवान अपने भक्त की सभी इच्छाओं की पूर्ती करते हैं.

लिंगाष्टकम (Lingashtakam) के लाभ

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार लिंगाष्टकम (Lingashtakam) भगवान शिव के हृदय के करीब बसने का सबसे आसान रास्ता है. इस स्त्रोत के जाप से हम बहुत जल्द शिव का आशीर्वाद पा सकते हैं. इसके लिए सुबह उठ कर स्नान करने के बाद शिव के लिंगरूप का पूजन करें इससे आपको बेहतर अनुभव देखने को मिलेंगे.

इसके इलावा शिवरात्रि के समय इन श्लोकों का जाप करने से स्वयं शिव भगवान प्रसन्न हो जाते हैं और हमारे सभी प्रकार के दुःख दर्द का नाश कर देते हैं.

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