ऐतिहासिक प्रसिद्ध तारा देवी मंदिर – लगभग 250 वर्ष पुराना है

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Tara Devi Temple
तारा देवी मंदिर

तारा देवी मन्दिर: भारत एक बहुत बड़ा धार्मिक स्थल है. यहाँ समय – समय पर देवी देवताओं ने जन्म लिया है और दुष्टों का नाश किया है. यहाँ जगह – जगह मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे हैं जिसके कारण यह देश कईं लोगों का पर्यटक स्थल बन चुका है. आज हम आपको दुर्गा माँ के नौवे रूप माँ तारा के मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं. इस मंदिर को तारा देवी मन्दिर के नाम से देश भर में जाना जाता है. हर साल लाखों लोग मंदिर में माँ तारा के दर्शन करने आते हैं. तारा देवी मन्दिर शारद नवरात्रि के पर्व के लिए ख़ास रूप से जाना जाता है.

तारा देवी मन्दिर का इतिहास

गौरतलब है कि दुर्गा माँ के नौवें रूप का यह पावन स्थल अर्थात तारा देवी मन्दिर आज से लगभग 250 वर्ष पुराना है. इस मंदिर की स्थापना पश्चिम बंगाल के एक राजा ने करवाई थी जो सेन वंश से ताल्लुक रखता था. इस मंदिर में तारा माँ की प्रतिमा की ख़ूबसूरती सच में देखने लायक है. प्रतिमा की खासियत यह है कि इसे लकड़ी से बनाया गया है. तारा देवी मन्दिर में शरद नवरात्रि में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है जहाँ लाखों की संख्या में भक्त दर्शन करने पहुँचते हैं. नवरात्रि में यहाँ एक मेला भी लगाया जाता है जहाँ कुश्ती जैसे जांबाज खेलों का प्रदर्शन किया जाता है. तारा देवी मन्दिर से शिमला, शोघी का नज़ारा बेहद लुभावना होता है.

तारा देवी मंदिर

तारा देवी मन्दिर की कथा

ऐसा माना जाता है कि तारा देवी माँ क्योंथल रियासत के राजपरिवार की कुलदेवी थीं। क्योंथल रियासत का राजपरिवार सेन वंश का है। एक कथा के अनुसार- राजा भूपेंद्र सेन जुनबा से गाँव जुग्गर शिलगाँव के जंगल में आखेट करने निकले, जहाँ पर माँ भगवती तारा के सिंह की गर्जना झाड़ियों से राजा को सुनाई दी। फिर थोड़ी देर के बाद एक स्त्री की आवाज गूंजी- “राजन! मैं तुम्हारी कुलदेवी हूँ, जिसे तुम्हारे पूर्वज बंगाल में ही भूल से छोड़कर आए थे। राजन! तुम यहीं मेरा मंदिर बनवाकर मेरी मूर्ति स्थापित करो। मैं तुम्हारे कुल की रक्षा करूंगी। राजा ने बिना समय व्यर्थ करे अपने महल से दिखने वाले सबसे ऊँचे पर्वत पर माँ तारा के मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया. मंदिर का निर्माण होने के पश्चात राजा ने माँ तारा की मूर्ति बना कर विधिवत प्रतिष्ठा की और मंदिर में स्थापित की. और तब से तारा देवी मन्दिर उत्तर भारत का मूल स्थान बन गया. बताया जाता है कि एक समय में यह मंदिर पूरी तरह से खंडर में बदल गया था जिसके बाद इसका पुन: निर्माण जयशिव सिंह चंदेल और कुछ अन्य श्रद्धालुओं ने मिल कर करवाया.

हाल ही में अभी मंदिर में नए भव्य भवन का निर्माण किया गया है जो लकड़ी से बनाया गया है. मंदिर का द्रश्य देखते ही बनता है. तारा देवी के मंदिर में हर मंगलवार और रविवार को भक्तों द्वारा भंडारे का आयोजन किया जाता है.

कहाँ है तारा देवी मन्दिर?

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर तारा देवी मन्दिर स्थित है. मंदिर तक सड़क का निर्माण किया गया है और आप मंदिर तक पैदल तारा देवी से या फिर शोघी से होकर भी जा सकते हैं. शोघी से मंदिर की दूरी केवल ५ km है.

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